पहचान ज़िंदगी की

चलो यूँ ज़िंदगी आसां हो गई
कुछ अपनों की पहचान हो गई
दुनिया मे जीने की चाहत और अंजान हो गई
ज़िंदगी के जीने का कुछ यूं अंदाज बनाते है 
ज़िंदगी को थोड़ा अजनबी बनाते है 

अजनबियों से दूरियां रहें भी तो कोई गम नहीं 
ज़िंदगी लगता है जैसे अब 
अजनबियों  के बीच ही बिताते है 

थोड़ा दर्द भी कम होगा 
थोड़ा बोझ भी दिल का कम होगा 
चलो अब अजनबियों से ही दोस्ती बढ़ाते है 
ज़िंदगी को कुछ यूँ आसां बनाते है 

अपने ही दे रहे जख्म और गम 
तो लगता है अपने ही हों कुछ कम 
चलो अपनों से दूरियां बढ़ाते है 
और अजनबियों के साथ ही ज़िंदगी बिताते है
और ज़िंदगी तुझे आसां  बनाते है 

ज़िंदगी तुझे आसां  बनाते है 
प्रकर्ति के नियमो को अपनाते है 
ना कुछ एक सा था 
ना कुछ एक सा रहेगा 
ये ही प्रकृति के नियम समझाते है 
चलो ज़िंदगी तुझे यूँ आसां  बनाते है 


शालिनी गुप्ता 


२. 
ज़िंदगी अनभुजी पहेली है 
ऐसे खुद ही सुलझाना है 
ज़िंदगी खाली और सूनी है 
तो खुद ही उसे सजाना है 
प्यार के नग्मे गाकर उसको खुद ही दिलचस्प बनाना है 

अकेले है तो खुद ही अपने लिए समय लगाना है 
हर बात का हल है 
हमें सवालों में नहीं खुद को उलझाना है 
कुछ अपने और कुछ लोगों के साथ 
सम्बन्ध जोड़कर इस ज़िंदगी को बिताना है 

खुद को मायूस और उदास न रख 
खुशिओं को अपनी खुद ही ढूंढ कर पाना है 
आसां तो नहीं है ज़िंदगी का सफर 
उम्र के एक पड़ाव के बाद 
पर हमें इसे आसां बनाना है 
इसे हमें खुद ही आसां बनाना है 

३. 
माँ ही है जो आँचल मे छुपाकर धुप छाँव से बचाती है 
माँ ही है जो हर तूफां से बचाती है 
माँ ही है जो हमारे हर नाज़ नखरे उठाती है 
माँ ही है जो अपनी दुआओं से हमें हर बला से बचाती है 
माँ ही है जो काला टिका लगाकर हर बुरी नज़र से हमें बचाती है 
माँ है तो घर मे आवाज आती है 
माँ ही है जो पास ना होकर भी हमारे अहसासों में हमारे साथ रहती है 
माँ ही है जो अंधेरो से निकालकर हमें रौशनी दिखाती है 
माँ ही है जो हमारी एक आहट पर सोते हुए भी जग जाती है 
माँ है तो ज़हाँ में अपनापन लगता है 
माँ है तो ये संसार अपना सा लगता है 

४.
कुछ परेशां सा हो जाता है 
कुछ घबरा सा जाता है 
मन ही तो है 
कहाँ संभल कर रह पाता है 
भागता है खुशिओं के पीछे 
सामना ग़मों से हो जाता है 
मन ही तो है 
कहाँ रुक कर रह पाता है 
भागता रहता है ये हर परिस्थिति से 
सब कुछ अपने हिसाब से ही चाहता है 
पर कुछ भी तो नहीं अपने हाथ में 
ये कहाँ समझ पाता है 
मचल जाता है 
यूं ही फिसल जाता है 
अपने हाथ में कहाँ ये रह पाता है 
जीवन को जीने का मर्म 
कहाँ ये समझ पाता है 
कितने समझौते कितनी परेशानियों से ये बचना चाहता है 
हर हाल में ख़ुद को बस में रखकर चल पाना कहाँ इसको आता है 
मन ही तो है मचल ही जाता है 









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