मन ही तो है

कुछ परेशां सा हो जाता है
कुछ घबरा सा जाता है
मन ही तो है
कहाँ संभल कर रह पाता है
 
भागता है खुशिओं के पीछे
सामना ग़मों से हो जाता है
मन ही तो है
कहाँ रुक कर रह पाता है
 
भागता रहता है ये हर परिस्थिति से
सब कुछ अपने हिसाब से ही चाहता है
पर कुछ भी तो नहीं अपने हाथ में
ये कहाँ समझ पाता है

मन ही तो है
 
मचल जाता है
यूं ही फिसल जाता है
अपने हाथ में कहाँ ये रह पाता है
 
जीवन को जीने का मर्म
कहाँ ये समझ पाता है
कितने समझौते कितनी परेशानियों 
से ये बचना चाहता है
हर हाल में ख़ुद को बस में रखकर 
चल पाना कहाँ इसको आता है
 
मन ही तो है 
मचल ही जाता है


शालिनी गुप्ता 

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