ज़िंदगी एक पहेली

ज़िंदगी अनबूझी पहेली है
इसे खुद ही सुलझाना है
ज़िंदगी खाली और सूनी है
तो खुद ही उसे सजाना है
प्यार के नग्मे गाकर 
उसको खुद ही दिलचस्प बनाना है

अकेले हैं 
तो खुद ही अपने लिए समय लगाना है
हर बात का हल है
हमें सवालों में नहीं खुद को उलझाना है
कुछ अपने और कुछ लोगों के साथ
संबंध जोड़कर इस ज़िंदगी को बिताना है

खुद को मायूस और उदास न रख
खुशिओं को अपनी खुद ही ढूंढ कर पाना है

आसां तो नहीं है ज़िंदगी का सफर
 
उम्र के एक पड़ाव के बाद
हमें इसे आसां बनाना है
इसे हमें खुद ही आसां बनाना है


शालिनी गुप्ता 

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