नई सुबह

जब छाता है परेशानिओं का बादल
सब कुछ जैसे खो सा जाता है
चाहे कुछ पल के बाद छट  जाये वो बादल

लेकिन उस पल से पहले के पलों में इंसान
अपना सब कुछ लुटा सा पाता है
उन पलों को जीना उसके लिए
बहुत मुश्किल सा हो जाता है

उन पलों में ना जाने वो क्या क्या कर जाता है
आँधी की तरह वह पल अपने साथ बहुत कुछ उड़ा ले जाता है
चैन, धैर्य, साहस, ये सब इन्स्सन के पास तब कहां रह पाता है

उन पलों से केवल अपने को घिरा पाता है
छटपटाता है,  तड़पता है और ना जाने क्या क्या हो जाता है

जब छाता है परेशानिओं का बादल
तब दुख की बारिश और
सुख का अभाव ही सिर्फ नज़र आता है

परेशानिओं में इंसां भटक सा जाता है
अपने से ही अपने को वह नहीं बहला पाता है
जाने कहाँ कहाँ वो जाता है

बहुत मुश्किल हो जाता है उस बादल को हटाना
बहुत मुश्किल हो जाता है इस दौर को जी पाना

पर फिर भी इंसां को चाहिए
परेशानिओं में ना खुद को वो बेचैन करे
उस परेशानी का ख़ुदबखुद समाधान करे

परेशानिओं के बादल छटने का इंतज़ार करना होगा
हर रात के बाद सहर है
इसलिए इस रात को उसे जीना होगा

और उन परेशानिओं को ख़ुदबखुद ही दूर करना होगा
कोई नहीं आता रोते हुए को हसाने को
कोई नहीं आता गिरते हुए को उठाने को

सब को  ख़ुदबखुद ही उठना होगा
खुद ही रो कर हँसना होगा
अपने को जीत कर ही हर इंसान को जीना होगा

शालिनी गुप्ता
 



 

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