आत्मसंतुष्टि

सब कुछ है इंसान के पास
पर सुकून कहा है
सब कुछ है फिर भी संतोष कहा है

इंसान से इंसान ही जलता है
इंसान से इंसान ही मरता  है
ये दोष कहाँ है

प्यार ही  ढूंडता है , प्यार ही मांगता है
पर इस शब्द का जैसे सिर्फ नाम ही नाम है
अर्थ कहा है

इंसान तो भाग रहा है सिर्फ दौलत के पीछे
और  किसी का कोई मकसद ही कहाँ है
चाहे मैं  ही सही, दोषी मैं  भी हूँ
मगर इन सवालों का अंत कहा है

क्या यही ज़िन्दगी और यही हालात है
अगर यही सब है तो
वो जज्बात, वो एहसास कहाँ है

जो हो किसी के लिए वो अरमान कहाँ है
सब कुछ है यहाँ मगर संतोष और सुकून कहाँ है

शायद ये आबो हवा का है असर
वर्ना ऐसे तो हालत ना थे
ऐसे तो इंसान ना थे

शायद ये दुनिया बदलेगी एक  दिन
जब इंसान दौलत को छोड़कर
खुद को ढूंढेगा, खुद को पायेगा
और खुद के ही नामो निशाँ  छोड़ कर जाएगा

शायद वो दिन आएगा
जब इन्सान यूँ तो दौलत से ना जाने जाएगा
वो इससे भी अलग अपनी एक पहचान बनाएगा
और अपने नाम से ही सिर्फ इस दुनिया में जीएगा
जाना जाएगा
और इस दुनिया से जाएगा

शालिनी गुप्ता



    
   

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